ना जाने आज क्या हुआ कि,
वो गांव फिर से याद आने लगा
कभी उस मिट्टी को देख पाएंगे या नहीं
ये डर अंतर्मन को सताने लगा,
आज वो सब याद आता है
जिसे मैं उससे दूर आकर भूल गया
वो ओस की बूंदों में भीगी वो सुबह
और ताज़गी और बेफ़िक्री वाली शाम
यहां की सुबह और शाम में वो बात नहीं
यहां तो वो तारों की छांव वाली रात नहीं...
आज वो सब याद आता है
वो लहराते खेत वो खलिहान हमारे
मिट्टी में खेलती मुस्कान हमारे,
पेड़ पर लटके झूलों पर झूलता बचपन
फूलों की खुशबुओं से महकता आंगन,
यहां ना वो आंगन है और खलिहान नहीं
यहां की मिट्टी में भी वो सौगात नहीं...
ना जाने आज क्या हुआ कि,
वो गांव फिर से याद आने लगा
कभी उस मिट्टी को देख पाएंगे या नहीं
ये डर अंतर्मन को सताने लगा,
Vishal Mishra


