नहीं रहा वो बचपन अब कि,
खिलौनों के लिए रोया जाए।
आसां नहीं सपने इतने कि,
आंखो में लेकर सोया जाए।
कमजोर पकड़ इतनी भी नहीं कि,
कहीं भीड़ में खोया जाए।
बेशक मिलेगा फल बेहतर कि,
'बीज' वक्त पर बोया जाए।


नहीं रहा वो बचपन अब कि,
खिलौनों के लिए रोया जाए।
आसां नहीं सपने इतने कि,
आंखो में लेकर सोया जाए।
कमजोर पकड़ इतनी भी नहीं कि,
कहीं भीड़ में खोया जाए।
बेशक मिलेगा फल बेहतर कि,
'बीज' वक्त पर बोया जाए।