"Coming out of the closet" is a metaphor for LGBT people's self-disclosure of their sexual orientation or of their gender identity. The pain and suffering that goes into the process of coming out can only be felt by someone who has been through it. This poetry is merely an attempt to understand their emotions and the turmoil they face :
कपड़ों की सलवटों के पीछे
जो कभी मेरे थे नहीं,
बैठा रहा मै आंखें मीचे
डर ज़हन में थे कई,
हर रोज़ कतरा कतरा करती हो जैसे आरी,
वो बंद अलमारी !
ताली के छेद से तलाशता
वो एक ज़र्रा रोशनी का,
कितने अरसे ख़ामोश था
जैसे असर बेहोशी का,
दरवाज़े अकेले खोलना पड़ रहा था भारी,
वो बंद अलमारी !
उस फरेब की घुटन में
खुद में खुद को खोजता,
अलग होने की चुभन में
गैर लफ्जों से था नोचता,
कुछ गलत सा हूं, कहती ये दुनिया सारी,
वो बंद अलमारी !
उस किरदार को पीछे छोड़कर
मुद्दतों से कैद था जिसमें,
दो रंगों की बेड़ियां तोड़कर
इन्द्रधनुष कैद था जिसमें,
खुद को दुनिया से मिलाने की अब है बारी,
खुल गई, वो बंद अलमारी!


