एक रोज़ चांद उतर आया मेरी खिड़की पर
करने लगा मुझसे बातें
जैसे हो कोई अपना अंतरंग साथी
मैंने भी मारी कुछ गप्पे
सुनाए किस्से कुछ झूठे कुछ सच्चे
फिर वो मुड़ा जाने को
मैंने देखा उसकी गर्दन पर दाग और पूछ बैठा
वो बोला कुछ भी बेदाग नहीं होता
कोई भी
तब से बंद है मेरी यूटोपिया की खिड़की