गुनाह कोई नहीं, फ़िर भी ख़फ़ा है!जाने ज़िन्दगी की, ये कैसी वफ़ा है?दिल भी निकालकर रख देते हम तो!फिर सोचा,कौन सा ये पहली दफ़ा है!!विरेश✍