मैं कविता हूँ !

अब मैं ऊब चुकी हूँ 

चार दीवारी मे बंद रहकर फलते-फूलते


मैं नदियों मे डूबना चाहती हूँ

झीलों मे तैरना चाहती हूँ

पहाड़ों से चीखना चाहती हूँ

झरनों से फिसलना चाहती हूँ

बर्फ पर दौड़ना चाहती हूँ

मरुस्थल मे रुकना चाहती हूँ


जहाजों पर चढ़ना चाहती हूँ

पानी के भी और हवा के भी


मैं चाहती हूँ कि बच्चों को सिखाऊँ

मैं चाहती हूँ कि बड़ो को समझाऊँ


मैं चाहती हूँ कि कुछ करूँ

बिलखते लोगों का पेट भरूँ


बड़ते कचरे को भी साफ करूँ

मन के भी और दुनिया के भी


मैं कविता हूँ !

अब मैं ऊब चुकी हूँ 

चार दीवारी मे बंद रहकर फलते-फूलते


- वीरेन्द्र