किसी को छोड़कर जाना मुझे अच्छा नहीं लगता,

यूँ दिल को तोड़कर जाना मुझे अच्छा नहीं लगता।

मुझे अच्छा नहीं लगता तेरा यूँ टूटकर रोना,

*वजह रोने की बन जाना मुझे अच्छा नहीं लगता*।

तू शहज़ादी है,तेरे ख़्वाब हैं ऊँची इमारत के,

तेरे कमरें में तहखाना मुझे अच्छा नहीं लगता।

समझती थी बिना बोले मेरी हर बात को तू क्यूँ,

अब अपनी बात मनवाना मुझे अच्छा नहीं लगता।

कई बारी तुझे व्हाट्सअप किया है रात जग जग कर,

 तेरा ब्लू टिक से जलाना मुझे अच्छा नहीं लगता,l

दरख्तों में बसाये घोंसले मैंने लहू देकर,

परिंदो का यूँ उड़ जाना मुझे अच्छा नहीं लगता।



#अनुज द्विवेदी *विराग*