ये तो यादों का इक लम्हा है जिसको मैंने खो दिया
अब न याद रहा कुछ भी किस ने किस को क्या दिया
वो इस जिंदगी का बहार था जो इक खिजां में उजड़ गया
मैं अपनी राह पे चल दिया वो भी अपनी राह चला गया
अब गिला करें भी तो क्या करें कोई सुनने वाला नहीं रहा
जिस को सुनना था मुझे इक वो ही रूठ कर चला गया
वो जीवन का इक ख्वाब था जो ख्वाब बन कर ही रह गया
मैं गले लगाता रहा उसे जो महफिल से उठ कर चला गया
मैं भी कितना अजीब था जो कफ़-ए-ख़ाक से वफ़ा किया
मैं उसके ख़ाक-ए-पा ही था वो मुझे कुचल कर चला गया


