बहुत याद आती हैं

वो बचपन की टोलियाँ

गालियाँ वो छोटी छोटी

वो शरारत भरी बोलियाँ

वो बचपन की क्रिकेट

पहले अपनी बैटिंग करना

दोस्त गया सुसू करने

फिर दोस्त की बैटिंग करना

आउट हो गये अगर पहली बाॅल पर

लड़ जाना यूं ही सबसे

ये तो ट्राई बाॅल थी

क्या सेटिंग थी प्यार कितना था

लड़ना झगडना आंसू बहाना

कभी ना मिलेंगे जैसे अब जिंदगी में

गुस्से में सबसे कट्टी कर जाना

मगर बचपन तो बचपन था

5 पैसे का बर्फ का गोला खा पल भर में

बर्फ के जैसे झट से पिघल जाना

याद बहुत आता है वो बचपन

चिंता थी कोई ना कोई उलझन

मगर अब में बडा़ हो गया हूं

दूर बहुत दूर खुद से हो गया हूं

घमंड की एक चट्टान बन गया

पैसे कमाने का जैसे

अब केवल एक सामान बन गया ।

डॉ .विनोद कुमार