मेरे देश में मायने तरक्की के

बड़े अजीब से दिखते हैं

अपने हो जाते हैं अनजान

अनजान करीब से दिखते हैं

देश हो जाता अपना ही पराया

किस्से पराये देश के

सबकी जुबां पे मिलते हैं

आंगन वो जिसने चलना सिखाया

हो जाता है वीरान

टूटी छत जर्जर दीवारों पे

परिंदे फड़फड़ाते हुए दिखते हैं

माँ बाप मर जाते हैं राह ताकते

पुकारने पर भी हजार

कहाँ बच्चे माँ बाप से मिलते हैं

मेरे देश में तरक्की के मायने

बड़े अजीब से दिखते हैं ।

डॉ .विनोद कुमार