शहर में मेरे हैवानियत का

जैसे कड़वा जहर घुल गया

होने लगे हैं बलात्कार

अब नन्हें फरिश्तों के

लगा माथे तिलक पाखंडी

पहन राम का चौला रावण भी

अब तो यारों राम बन गया

महफूज रही ना बहन बेटीयां

घर के अंदर ना घर से बाहर

मर गई इंसानियत

कटने लगे हैं इंसा

ईद के बकरे के जैसे

अब छोटी छोटी बात पर

कफन का मेरे शहर में

बाजार बहुत गर्म हुआ है

हवा में हर तरफ

जहर सा घुला है

नशा कौन सा हैवानियत का

लोगों के दिमाग़ चढ़ा है

कत्ल करके बेदर्दी से इंसानियत का

हर इंसा नेक दिखने का

क्या खूबसूरत स्वांग रचा है  ।

डॉ .विनोद कुमार