नौटंकी सारा ज़माना
नौटंकी इसके खेल हैं
मरने पर रोए सब छाती पीटें
जिंदा रहते ना कोई मेल है
हर रिश्ते की चिता आज
जीते जी ही जलती है
बेशर्म हुई ये दुनियां कितनी
प्यार के रिश्तों पर कफन उढ़ाकर
बस पैसों से चलती है
बीत जाती उम्र मात पिता की
औलाद को सबकुछ देनें में
बूढ़े मां और बाप की हड्डियां
बंद कमरों में आज सिसकती हैं
छोटा था बेटा
कांधे बैठा करता था
बड़ा हुआ
जबसे पैसे वाला हो गया
छिन गया प्यार बूढ़ी आंखों का
बुढ़ापा
वीरान कमरे में खो गया ।
भंडारे हैं चारों तरफ
चारो तरफ पूजा पाठ
भूखे रह रहे तड़प तड़पकर
बंद कमरो में मां और बाप
नौटंकी सारा ज़माना
नौटंकी इसके खेल हैं
मरने पर रोए सब छाती पीटे
जिंदा रहते ना कोई मेल है ।
डॉ .विनोद कुमार
दिनांक : 3/7/2019
प्रात : 9 बजे


