बेटियाँ बुनियाद हैं घर की
इज्ज़त की पगड़ी बाबुल की
घर एक नहीं दो चमके इनसें
शान हैं ये तो आंगन की
बेटियाँ हैं तो हैं बहनें प्यारी
रक्षा बन्धन के मेले हैं
बेटियाँ नहीं तो सूनीं हैं डोली
सर पर कहां फिर ममता का आंचल
फिर कहां माँ की मिश्री सी बोली
बेटियां तो माँ बाप का साया
संग मात पिता के ता उम्र हैं चलती
दुर्गा का हैं रुप बेटियां
जिस घर रहती उसको जन्नत करती
बेटी तो है रुप प्यार का
बलिदान का और त्याग का
जो समय की तपन को जीती हैं
पीती आँसू ख़ुद ही हंस हंस कर
खुशियाँ अपने हिस्से की सब
अर्पण परिवार को कर देती हैं
आओ यारो मिलकर हम सब
अंखियों में थोडे अश्क भरें
ना मरे बेटी अब कोख में कोई
सब मिलकर ऐसा संकल्प करें
बेटियाँ तो बुनियाद हैं घर की
इज्जत की पगड़ी बाबुल की
घर एक नहीं दो चमके इनसे
शान हैं ये तो आंगन की ।
डाँ.विनोद कुमार


