मीठास प्यारी सच्चे रिश्तों की

गुस्सा और अहंम खा गया

हंसी वो खुशी बनके है दुश्मन

कीड़ा बनकर वहम खा गया

कुछ मोती पिरोये थे मैंने

मीठे रिश्तों के सुन्दर सपनों के

मेरी तो वफा का तोता ही

धागा माला का काट गया

क्यूं वक़्त भी रुठा लगता मुझसे

आंख मिचौली खेलता

क्यूं लबो से है मुस्कान छीनकर

भंवर में अश्कों के ढकेलता

हम झुके ना उन्होंने झुकना सीखा

लेकर अंहम पहाड सा

बस दोनो ने अड़ना सिखा

टूटा पहाड़ अंहम में जब टुकड़े टुकड़े

फिर कहां पहाड़ ने जुडना सीखा ।

डॉ .विनोद कुमार