क्यूं हुआ मायूस इतना
क्यूं जिंदगी से हार रहा
देख दुखों के टीलें क्यूं
दूर खुद से भाग रहा
तूने तो चट्टानों के
सिने की धड़कन देखी है
तूने तो उठती लहरों में
नोका की उलझन देखी है
पेड़ है तू तो पीपल का
क्यू मिट्टी से घबरा रहा
बिन पानी के तूने तो
खुद को अश्कों से सींचा है
पर्वत की छाती पर तूने
खींची अभय की रेखा है
बात है यूं तो छोटी बहुत
बस आज में तुझको जीना है
सहारा है तू खुद का सच्चा
ज़ख्मों को रख दिल में अपने
हंस हंस के खुद ही सीना है
क्यूं हुआ मायूस इतना
क्यूं जिंदगी से हार रहा
देख दुखों के टीले क्यूं
दूर खुद से भाग रहा ।
डॉ .विनोद कुमार


