जिंदगी एक सफर है

सबको मंजिल की तलाश है

सब भाग रहे हैं

बस भाग रहे हैं

अपने अपने हिस्से की जमीं

बस नाप रहे हैं ।

जानते हैं हिस्सा अपना

लेकिन

सब मुट्ठी में करना है

एक कफन

दो गज जमीन

ये ही तो है जो अपना है ।

यही आखरी मंजिल

जहाँ सबको थम जाना है

आगे कोई सफर ना मंजिल कोई

माँ की कोख से शुरू हुआ सफर

धरती माँ की कोख में

आखिर एक दिन रूक जाना है ।

क्यूं भाग रहे सब

छोड़ जिंदगी

मौत की तलाश में

जागे हैं फिर क्यूं

सोए सोए से लगते हैं

अपनों की भीड़ में भी क्यूं

खोए खोए से लगते हैं ।

मंजिल सबकी एक है

फिर अंहकार क्यूं है

रिश्तों से खो रहा फिर

वो मीठा प्यार क्यूँ है ।

डॉ.विनोद कुमार

दिनांक: 29/6/2019

प्रात : 6: 30 बजे