सभी मौन हैं
हल्का हल्का शौर है
भेड़िये अपनी चौखट से दूर हैं अभी
आंगन उजड़ गए एक के बाद एक कई
इज्जत बहन बेटियों की तार तार हो रही
चींखे दर्द भरी क्यूं सुनाई नहीं देती
लहू में लतपत बेटीयों की चींख
गूंगी बहरी सरकारों को सुनाई नहीं देती
कभी इसकी सरकार कभी उसकी
उनकी सरकार में ब्लात्कार 25000 थे
हमारी सरकार में 24500
क्या बलात्कार आंकड़े है महज ?
बहन बेटी का दर्द, चींखे,उनके आंसू
उनका परिवार ,वो सुनापन
क्या कुछ भी नहीं ?
सभी मौन हैं
हल्का हल्का शौर है
भेडिये अपनी चौखट से दूर है अभी
शौर अपने अपने मतलब का
दूर दूर तक अंधेरा ही अंधेरा
दिखता नहीं कोई छोर जहाँ भोर है
सब साथ हैं यूं तो
इस दल के उस दल के
इस धर्म के उस धर्म के
इस जात के उस जात के
मुर्दा हैं सब मुर्दा
सभी गुलाम हैं
बोलते हैं रूख हवा का देखकर
मुर्दा जमीर
मुखौटा मसीहा का
दिल में एक शैतान है
सभी मौन हैं
हल्का हल्का शौर है
शौर कुछ दिन का
फिर वही नये भेड़िये नई बस्ती
फिर कोई बेटी
फिर वही बड़ी बड़ी बहस
अदालतों में इंसाफ के लिए चक्कर
दबंगो के पीडित परिवार पर हमले
परिवार की दुर्घटना का स्वांग
सबूतों के आभाव
नई नस्ल के भेड़ियों की बढ़ती फसल
बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ
नारी स्वाभिमान के जयकारे
मगर कैसे ?
जिधर देखो उधर दुशासन
कोतवाल देता है भाषण
रोए बेटी हंसता शासन
सब नंगे इस गंदे खेल में
क्या खाकी क्या खादी
छोटे बाबू बड़के बाबू
नई उपज पुरानी उपज के
नेताओं के घड़ियाली आंसू
कुछ पैसे और झूठी सांत्वना
एक दिन का कैंडल मार्च
कुछ दिन जोरदार टीवी पर चर्चा
घीसे पीटे कुछ आश्वासन
दोषियों को छोड़ा नहीं जाएगा
पकोडोगे कब ?
कब जमीन चाटेंगे खूनी दरिंदे
कब टूटेगी गर्दन उनकी
फंदे में फांसी के
जकड़ोगे कब ?
सब मौन हैं
हल्का हल्का शोर है
भेडिये अपनी चौखट से दूर हैं अभी
मगर कितने दिन
भेडिये हैं एक दिन चौखट लांघ जायेंगे
उठो जागो मुर्दों के शहर के मुर्दों
बोलो आवाज उठाओ
जीभ कटने पर भी एक बेटी
दर्द का मंजर बोल गई
गंदे समाज की गंदी नीयत की
सारी पोल तो खोल गई
कब जागेंगे कोतवाल
कब न्याय की देवी की आंखो से
बधी वर्षों से पट्टी खुलेगी
कब समाज उठेगा जात धर्म से ऊपर
कब हर बेटी अपनी बेटी जैसी लगेगी
कब वोट से ऊपर होगी इंसानियत
कब गरीब की भी न्यूज बनेगी
जागेगा समाज कब जागेंगी चेतना
कब भेडियों की फसल रूकेगी
कब आएगी वो सुबह सुनहरी
जब नारी भी निर्भय जियेगी।
डॉ .विनोद कुमार
01/10/2020


