सपने अपने सभी तोड़कर
बच्चो की आंखों में जो सपने दे
आंखों में लेकर अश्कों का समंदर
एक आंसू ना बच्चो का गिरने दे
जो खुद गिरता, लड़खड़ाता
पर बच्चो को कांधे रखता है
वो पिता ही तो है
जो बच्चो से हार कर हंसता है
वो पिता ही तो है
नींदे खोकर अपनी आंखो की
नींद चैन की बच्चों को देता
भविष्य की खातिर बच्चो के
हर खुशी छोड़ वीरान सा रहता
भटके ना जीवन में बच्चे
खुद को बहुत कठोर दिखाता
अक्सर फूलों संग होते हैं कांटे
कांटो से बचना सिखलाता
वो पिता ही तो है
जो जीवन के लम्बे सफर पर
रोम रोम बच्चो को दे जाता
टूट जाते पंख एक दिन खुदके
बच्चों को मगर आकाश उड़ाता
वो पिता ही तो है ।
डॉ .विनोद कुमार
दिनांक : 28/6/2019
प्रात: 6.30 बजे


