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फ़नकार समझते हैं ghazal by Vinit Singh Shayar

ख़ामोश ज़ुबाँ को सब बीमार समझते हैं

हरक़त ना करो तो सब दीवार समझते हैं


हम हैं कि साथ उनके चलना हैं उम्र भर और

वो हैं कि मोहब्बत को खिलवाड़ समझते हैं


उनके "ना" में भी समझता हूँ मैं सहमत

मेरी " हाँ" को भी जो इनकार स

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