रुक तुम भी सकती थी,

रोक मैं भी सकता था।

 

समझ तुम भी सकती थी,

कह मैं भी सकता था।

 

तुम्हें कुछ जल्दी थी शायद,

मुझे कुछ बेफिक्र मंदी थी शायद।

 

यकीन तो था ही नहीं

कभी ऐसा भी होगा,

मिलेंगे नहीं कभी

ज़िंदगी में ये फैसला भी होगा।

 

मैंने उम्मीद में चंद महीने

और गुज़ार दिये,बता भी दो अब

तेरी आदत के बेगैर

ये दिल कैसे जिए।

 

तुम रास्ता भूल गयी होगी शायद

रोज़ यही कह के मनाता हूँ इसे,

तेरे दीद के इंतज़ार में

दिल समय को कैसे सिए।

 

इतनी बेरुखी तो नींद ने भी नहीं की,

रोज डाटती है मुझे

कहती है भूल जाने की।  

 

शुक्र करो ना दिल को पता है

तुम्हारी रुस वाई का,

अब छोड़ो ज़िद

ना हश्र है कोई अपनी इस लड़ाई का।


 

आओ फिर खेलेंगे उन बातों से

जो गुम सी हो गयी हैं,

अब तो तुम्हारे बिना

मेरी ज़िंदगी थम सी गयी है।  


ये मन ही है

जो तेरे घर के पिछवाड़े रोज घूम के आता है,

और कुछ बताके तेरे बारे में

मुझे बहुत सताता है।

 

आँसू के भी भाव बढ़ गए

ये भी तुम्हें बताना था,

मिलना मुझे ज़िंदगी में

अभी और बहुत सताना था।