मेरे द्रीचे में, चाँदनी रात में,
रोशनी, साथ वाली दीवार पर,
अँधेरे कमरे में,
सहमी-सी बैठ जाती है।
जैसे किसी अंजान मकान में पहुँच गयी हो,
अपनी आँखें उस पर गड़ाए हुए, मैं यूँ ही रात गुजार देता हूँ,
मगर चाँद की रोशनी में वो बात नहीं,
अगर तुम होती तो ये रातें यूँ ना गुजरती,
ये रोशनी यूँ इतना ना इतराती,
तुम...... तुम इतनी दूर चली गयी हो क्या?
चाँद की रोशनी तो अब भी आ जाती है,
पर तुम्हारी कोई सदाएं, कोई खबर नहीं आती।


