
मेरे द्रीचे में, चाँदनी रात में,
रोशनी, साथ वाली दीवार पर,
अँधेरे कमरे में,
सहमी-सी बैठ जाती है।
जैसे किसी अंजान मकान में पहुँच गयी हो,
अपनी आँखें उस पर गड़ाए हुए, मैं यूँ ही रात गुजार देता हूँ,
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मेरे द्रीचे में, चाँदनी रात में,
रोशनी, साथ वाली दीवार पर,
अँधेरे कमरे में,
सहमी-सी बैठ जाती है।
जैसे किसी अंजान मकान में पहुँच गयी हो,
अपनी आँखें उस पर गड़ाए हुए, मैं यूँ ही रात गुजार देता हूँ,