पंखे की हवा से जब चद्दर का कोई कोना हिलता है

तो लगता है उसमे भी जान है।

सुख चुका पेड़ जब अपने तने से किसी को छाव

देता है तो उसकी भी उपयोगिता समझ आती है।

कोई कुपोषण से बावजूद भी अपने हड्डियों से भरे ढाँचे

से बोझ उठाता है तो हम देख सकते हैं

कि साहस और उद्देश्य से क्या कुछ नही हो सकता।

किसी जानवर को भी रोते देखते हैं तो

उसकी संवेदनाओं से उसके मानवीय होने को भी

हम महसूस कर सकते हैं।

मगर मुझे भारत सरकार की कोई उपयोगिता समझ नही आती,

इसका सरकारी तंत्र सड़ चुका है,

और जो ढाल देती है इन सब नेताओं को छुपने के लिए,

वो है एक धूल से सनी किताब, इसका संविधान