धरती काँपी अंबर काँपा और
काँप सारा पाताल गया ।
उस करुण चित्कार की गूँज से,
दहल स्वयं महा काल गया ।
पर तुझे न पीड़ा का भान रहा,
क्या तनिक भी न शेष इंसान रहा ।
जो असह्म पीड़ा का खेला रचा,
मरी मानवता, दरिंदा पीछे बचा ।
यह क्यों-कब इतना क्रूर हुआ
आखिर किस बात का इसको गुरुर हुआ ॥

