सफ़र फासलों का है ये बड़ा दर्द भरा,
गर हो मुम्किन,तो कोई और अज़ाब दो ना बड़ा
नहीं देखूँगा तेरी सूरत मैं कभी,
इन आँखों को कोई और पता दो ना ज़रा
बातों-बातों में बनी खामोशी की दीवार है ये
लफ़्ज की एक चोट से गिरा दो ना ज़रा
अश्क के दरिया में हूँ डूबा, गम के शरर में दहकता
और कब तक है तड़पना, ऐ मुंसिफ़ बता दो ना ज़रा
रोज मरता है विनायक, तुझपे मरता हुआ
कर मुकम्मल मुझको,मेरी चिता सजा दो ना ज़रा.....