साँझ से सुबह तक एक आंधी चलती है सन्नाटे के बाद की आंधी, जिसके शोर को मैं दिल में दबा लेता हूँ और साथ में बरसती बूंदों को मेरी आँखें छिपा लेती हैं। डर लगता है मुझे आँधी से नहीं, उससे पहले के सन्नाटे से और सन्नाटे का शोर कहीं मुझे बहरा ना कर दे इसलिए अपने कानों को दबाये सुबह का इंतज़ार करता हूँ। सुबह हरेक हलचल और शब्द में सुनाई पड़ती है वही खामोशी, जिससे भागते-भागते शाम हो जाती है और फिर धड़क उठता है दिल अंधड़ के भय से, ना जाने , ये तूफ़ान और मौन का खेल कब ख़त्म होगा.....!