ये शब देखता है और सब देखता है, सावन में भी पेट में है आग , कोई कब देखता है। दहक जेठ की,या पूस की ठिठुरन में सश्रम है कोई,क्या रब देखता है! कब मैं जलूँगा,या ठिठुर कर मरूँगा, या यूँ ही सड़ते-सड़ते मैं ज़िंदा रहूंगा मेरे इन्तेहाँ की क्या हद देखता है...। सूखे का मंजर,बाढ़ की आफत, "सेल्फ़ी" की आंधी में,हर शख्स देखता है। बेरहम कुदरत,स्वार्थी फितरत ये मैं ही तो हूँ, जो सब झेलता है, मैं ही तो हूँ,जो सब देखता है.....|