कल रात मैं चश्मदीद बना एक लड़ाई का

जिसमें योद्धा थीं, यादें और नींद

और मैं पड़ा था रणभूमि की तरह

युद्ध में हरेक पक्ष के युद्धकौशल का बारीकी से अवलोकन करता हुआ

जहाँ यादें दिन भर रणक्षेत्र में थीं फिर भी लेशमात्र भी थकीं नहीं

वहीं नींद, रात का साथ पाकर हमले कर रही थी

यादों के पास ताक़त थी मिलन की ,

सहनशक्ति थी विरह की, आनंद था खुशियों का

तो तप था गम का

इसीलिए शायद यादें हार नहीं मान रही थीं

नींद निष्ठुर,शुष्क लेकिन सतत प्रयत्नशील

उसे सहारा था तो बस रात का

नींद का हरेक वार क्षीण,जर्जर और कमजोर कर

यादें सर्वस्व अपना आधिपत्य फैलाये थीं

तो रात नींद का हौसला बढ़ा

उसे लड़ने की शक्ति और जीतने की प्रेरणा दे रही थी

रात के आखिरी पहर में ही सही यादों को परास्त होना पड़ा

चिर प्रयत्नशील नींद को एक लंबे प्रयास के बाद

आखिर जीत मिल ही गयी लेकिन ये क्या...!

यादों ने बस नींद का दिल रख लिया था

और नींद के आते ही ख्वाब बन

फिर से रणक्षेत्र पर अधिकार कर लिया

नींद बेचारी इस ठगी से अनजान थकी हुई सुस्ता रही थी

कि तभी गुलाबी सुबह ने दस्तक दी

और बहरूपिया यादें फिर से अपने असली रूप में आ गयीं

नींद हड़बड़ा कर उठ रणक्षेत्र छोड़ चली गयी

और इंतज़ार करने लगी एक ऐसी रात के आने का

जिसमें ना यादें हों ना ही उसका हमशक्ल ख्वाब..... 


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