कुछ मुलाकातें,
कुछ मीठी बातें,
कुछ शरारत
नज़रों की,
कुछ नज्में
इश्क मुहब्बत की,
कुछ प्यार
भरी लड़ाई,
कुछ मौसम
की अंगड़ाई,
कुछ मुस्काने
भीतर मन की,
कुछ महक
तेरे तन की,
कुछ ठहरना
चाँद के उगने पर,
फिर गिनना
तारें इक इक कर,
कुछ खुद से ही
बतिया लेना,
कभी खुद को
हँसा-रूला देना,
ये सब जब
होने लगता है,
फिर गज़ल, गीत
सब सजते हैं,
इतना सब कुछ
बिन तेरे कैसे
सम्भव हो पाता?
न तुम आकर
फिर वापस जाती,
इतना दर्द कैसे आता?
दूर-दूर रहने से,
देखो मैंने खुद के
दो हिस्से कर दिये,
इक में सारी
याद पुरानी,
इक लिखता है
नयी कहानी।