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याद


रोज़ भस्म करता हूँरोज खड़ी होती हैतेरी याद की उम्रहर रोज बढ़ी होती है

एक अंधा कुआं सा हैतेरी यादों का मेलाजितना भी जतन कर लूंये खत्म नही होता

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