की अब भी चाहिए मुझे साथ किसी का
मुझसे ये दूरी बर्दास्त नही होती
तुम तो थक गए कुछ ही लम्हों में
मुझसे ये अगन बर्दाश्त नही होती
तुम जिसे प्यार कहते हो
वो तुमसे कभी हुआ नही
तुमने सिर्फ मेरे बदन को
देखा ललचाई नज़रों से
और अगर मैं भी तुम्हारे इस
प्यार जो कि हवस है
मेरी नज़रों में तुमसे मांग लूँ
तो क्या तुम दे सकोगे
नही तुम नही दे सकते
तुम मुझे दोगे कुछ बूंद पानी की
जबकि मुझे तो सागर चाहिए
क्योंकि ऐसे तो मैं जल्दी
प्यार करती नही
और अगर मेरे मन में भी
उमड़ा तुम्हारे लिए भावनाओं का ज्वार
तो यकीन करो तुम
बह जाओगे मेरे अंदर के सागर में
तुम्हारा क्या है
तुम बुझा लोगे
अपनी थोड़ी सी प्यास
अलग अलग नदियों से
मुझसे पूछो
मैं तो अपनी प्यास
बुझाने के लिए सागर में
समाना चाहती हूँ
मेरे इस प्यार को जब कोई
नही समझता
तो मुझे जाना पड़ता है
कई रास्तों से सागर से मिलने की चाहत में
तब कोई नही समझता मेरी पीड़ा
बस मुझे अलग अलग
नाम से संबोधित करते हैं
कभी रंडी,कभी वेश्या तो कभी कुलटा
पर क्या ये नाम सिर्फ हम स्त्रियों के लिये
गढ़े हैं तुम पुरुषों ने
कभी सोचों अपने लिए भी
कुछ ऐसे ही नाम
जब तुम अपनी प्यास बुझाने
को मिलते हो अलग अलग नदियों से
मैं तो नदी हूँ मुझे बस
एक सागर की है तलाश
हो सके तो बन जाओ
तुम मेरे वो एक सागर
जिससे मिल कर मैं
बुझा लूँ अपनी सारी प्यास


