गुज़रे तो कई साल हमारी उम्र के आंगन से
फिसले तो कई लोग हमारे खुद के दामन से
पर ये साल कुछ अलग सा था
शुरुआत से ही इसका मिज़ाज कुछ अलग सा था
छूटे कई हाथ उनके अपनों से
टूटे कई साथ उनके अपनों से
न भर पाने वाले कई ऐसे जख्म दे गया
न सोचा था कई ऐसे दर्द दे गया
यूँ तो मिलेंगे लोग बहुत इस ज़माने में
न तुमसा कोई दूजा मिलेगा इस फसाने में
इस साल ने छीनी है होठों से मुस्कुराहटें
इस साल ने छोड़ी है गमों की आहटें
पर नियति को जो मंजूर होता है
मिलना बिछड़ना नियति का दस्तूर होता है
जाते हुए साल में सब बात जा रही है
न चाहते हुए भी तेरी याद आ रही है
के रोक सकता अगर मेरे बस में कुछ होता
तो हर साल की तरह इस साल में भी तू मेरे साथ होता
इज़्तिरार


