ये कैसा अंधेरा सा मेरे 

चारो तरफ फैल रहा है

आज राजा ही प्रजा

से खेल रहा है

बेबस और लाचार नज़रे

उम्मीद करें भी तो किससे

मौन राजा जब चीखें

भी अनसुनी कर रहा है

कल तक सुनते थे

झूठ को नही मिलती

स्वीकृति कुछ बोलने की

आज तो सच भी

बाहर निकलने की

आस में दम तोड़ रहा है

हालात इस कदर

हावी है मेरे देश में

आधा मुल्क आधे मुल्क

में ज़हर घोल रहा है

किसान,मज़दूर आंसू

बहा रहे आज सड़कों पर

लाठियां पड़ रही उनके तन पर

अपने घर में ही मिल रहे

उनको कैसे बदनुमा दाग

कोई उन्हें आतंकवादी

तो कोई गद्दार बोल रहा 

अरे ओ रहनुमा बनने वालों

इन बेबस के वोटों से

देश के भाग्यविधाता बनने वालों

कुछ तो शर्म कर लो

कुछ तो इनकी आवाजों को सुन लो

नही तो एक दौर भी ऐसा आएगा

तुमको तुम्हारा कर्म ही डुबायेगा

झूठ बोल कर कब तलक

तुम कुर्सी बचाओगे

पांच साल बीते

और तुम फिर कभी न आओगे