व्यथा ■■■■

आकाश काला वायु दूषित, व्यथित वसुधा आज है. भ्रष्टो की जयजयकार, सच्चे, सभ्य का उपहास है. देवता ताली बजाते, मंच पर यमराज है. उपदेश देते धूर्त जन, खामोश प्रज्ञ समाज है. रोता बिलखता है कृषक, हंसता पतित अय्याश है. श्रम की प्रतिष्ठा शून्य है, भ्रम का प्रतिष्टित नाच है. शेर जो थोड़े बचे, चिड़ियाघरों में है पड़े. यह भेड़ियों का व्यूह है, गिद्धों के सर पर ताज है..||