
विश्वास ■■■■■■ लक्ष्य कितना भी बड़ा, अनभ्यस्त पर्वत सा खड़ा, समझो तुम्हारे पास है, खुद पर अगर विश्वास है ।।
निराश्रयता से घिरे, हर चेष्ठा पर तुम गिरे, कितनी भी आयीं आँधियाँ, सौ बार तुम टूटे जुड़े, फिर भी नही विचल
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विश्वास ■■■■■■ लक्ष्य कितना भी बड़ा, अनभ्यस्त पर्वत सा खड़ा, समझो तुम्हारे पास है, खुद पर अगर विश्वास है ।।
निराश्रयता से घिरे, हर चेष्ठा पर तुम गिरे, कितनी भी आयीं आँधियाँ, सौ बार तुम टूटे जुड़े, फिर भी नही विचल