बदल जाएंगी सरकारें वो मिट जाएंगे दुनिया से, जिन्हें खैरात और सम्प्राप्त में होती गलतफहमी, अगर खुद पर भरोसा और सर पर हाथ है माँ का, उतरता आसमां कदमों में क्या औकात दुनिया की.   वो क्या जानेंगे हर इक बूंद गिरते स्वेद की क्या है, जिन्हें  जीवन के हर एक मोड़ पर खैरात की लत है, उठाकर गर्व से मस्तक   कभी न  बोल पाएंगे, जिनके तुच्छ भिक्षावृत्ति जीवन का घृणित सच है.   उदर मष्तिष्क से ऊपर स्थापित होगया जिनका, उन्हें कब आत्ममंथन और निज उत्थान के अवसर, उनसे न्याय और सम्मान की उम्मीद क्या करना, समझना जिनको मानव मात्र का गौरव  रहा दूभर .   भले कम हो मगर वह कर्म की उज्ज्वल कमाई हो, तू जब देखेगा मुड़कर स्वयं पर इतरायेगा एकदिन, तुम्हारे पास जितनी   हो प्रतिष्ठा श्रम से आई हो. तुझे खुद रास्ता मन्ज़िल तलक ले जाएगा एकदिन,   है जिसके कर्म जैसे फल भी एकदिन मिलना निश्चित है, अगर निश्छल है "क्यों" और "कार्य" की गरिमा सुरक्षित है।