जब गूथता हूँ आटा,
याद आ जाती है
चूल्हे के सामने बैठी माँ..
कैसे जला देती थी
अपनी थकान व पीड़ाओं को
चूल्हे की आग में..
और गूथती थी आटे में
ढेर सारा स्नेह और प्यार..
जिससे खुश रहता था परिवार।
मैं भी जलाना चाहता हूँ
अपनी पीड़ाओं को चूल्हे में..
पर जल जाती हैं खुशियां..
आटे संग गुथ जाते हैं आँसू,
फूलती रोटी में भी दिखता है
मेरा अहंकार...! "