ढूँढ़ता हूँ अब भी तुम्हें.. किताबों की पंक्तियों में, हाथ की रेखाओं में, बारिश की बूँदों में, टूटी हुई उम्मीदों में, तुम्हारे उपहारों में, लम्बी कतारों में, बाग की बहारों में, ढूँढ़ता हूँ अब भी तुम्हें... रात के सन्नाटों में, कदमों की आहटों में, अपनी परछाइयों में, रात की तन्हाइयों में, होली के रंगों में, उड़ती पतंगों में, ढूँढ़ता हूँ अब भी तुम्हें... कुरान की आयतों में, पुरानी रवायतों में, खेतों की क्यारियों में, आँखों की खुमारियों में, ढूँढ़ता हूँ अब भी तुम्हें... पुराने आख्यानों में, सुबह की अजानों में, गालिब की गजलों में, मज़ाज की नज्मों में, दिवाली के दीपों में, कोयल के गीतों में, ढूँढ़ता हूँ अब भी तुम्हें... तुलसी की चौपाईयों में, खैय्याम की रूबाइयों में, सखियों की ठिठोलियों में, खुसरो की पहेलियों में, ढूँढ़ता हूँ अब भी तुम्हें... गंगा की लहरों में, भीड़ भरे शहरों में, बच्चों की मुस्कानों में, खाली मकानों में, जिंदगी के मेले में, बैठ कर अकेले में, ढूँढ़ता हूँ अब भी तुम्हें...!!