जीते जी करिश्मा ये काश कर के देखते
मरने से पहले इक दफा मर के देखते
जिन राहों पे चलना है जिस्म छोड़ने के बाद
इस जिस्म में उन राहों से गुजर के देखते
रक़्स-ए-शरार-ए-ज़िन्दगी में जल गए हम
चांदनी में किसी झील में उतर के देखते
बिछड़े हुवे जिनसे हमको सदियां गुज़र गईं
मिलते कहीं तो आँसू भी उमड़ के देखते
हम अपने ही गुमान में बैठे थे इस तरफ
वो पुकारता तो हाल हम उधर के देखते
वो देखता है हर तरफ बस हम को छोड़ कर
अगर देखता हमें तो हम बिखर के देखते
सरसब्ज से सुना है कि शायरी नहीं होती
तो हम किसी की चाह में उजड़ के देखते
जाना था हमें एक दिन ये तय था पहले से
ज़िंदगी तो मगर पहले जी भर के देखते
~ विक्रान्त
