हमारे खाब हम नही बुन रहे
किसी का व्यक्तिगत फैसला
या व्यक्तिगत हार हमारा पीछा कर रही है
हर दम हर वक़्त।
हमारी हर मांग को अधूरा सा पूरा करने की शर्त हमे अक्सर बताती है , हमारे असली सपने गलत है।
पापा के घर आते ही,
भाग कर टी.वी न बन्द करना ,
गलत है।
घर में आये मेहमानों के सामने ,
ज़ोर से हँस देना गलत है।
गलत है खुद के ख़्वाबो को,
पुरा करने के ख्वाब देखना।
और गलत है आइ.आइ.टी के
अलावा कुछ और सोचना।
सौरभ तुम लड़के हो
तुम्हारा सफल ना होना तो गलत है ही
रोना भी गलत है।
सोनी तुम लड़की हो
तुम्हारा हँसना तो गलत है ही,
तुम्हारा किसी लड़के से बात करना भी गलत है।
जब गलत है ये सारी बातें
तो सवाल ये है कि सही क्या है ?
और इस सवाल का जवाब भी
एक सवाल ही है।
सही है फिज़िक्स की सारी किताब
रट जाना।
सही है ,न चाहते हुए भी मेहमानों के सामने
ठठा कर हँसना।
सही है, अपनी ख्वाहिशों को
अपने दिमाग से उखाड़ फेंकना।
सही है, अपनी सस्ती - महँगी
सभी इच्छाओं को उसी तकिये में दबा देना,
जिसमे कभी हमने अपने आंसू बहाए थे सबसे
छिपाकर।
और सही है जीते जीते नही
मरते मरते जीना और
मरते मरते ही
मर जाना
सही है।
~विक्रम