मोहब्बत तब भी थी, मोहब्बत अब भी है ।

एक शाम तब भी थी, एक शाम अब भी है ।


फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है

तब चाँद खिलता था, अब तो बस सूरज ढलता है।


तब खुद को पहचानता था मैं, पर अब खुद को जानने लगा हूँ ।

तब मोहब्बत तुझसे थी, अब खुद से करने लगा हूँ ।


-विकास सिंह