:गजल:
उदासियों का बवंडर बन गया हूँ मैं,
समय की मार से खंडहर बन गया हूँ मैं।
कभी महकता था गुलिस्ताँ-ए-बदन मेरा,
गुज़रा ज़माना सूखा शजर बन गया हूँ मैं।
मुद्दतों से कोई आया नहीं दिल-ए-सहरा में,
जीता हूँ मगर हारा हुआ सिकंदर बन गया हूँ मैं।
ये दुनिया मेरे अंदर से कब की मर चुकी है,
बचा कुछ नही अब कलंदर बन गया हूँ मैं।
अब कोई आह कोई चीख़ उठती ही नहीं है,
इतना टूटा हूँ कि पत्थर बन गया हूँ मैं।
अब किसी काम का नहीं रहा हूँ मैं ‘कुमार’,
बेकार-सा कोई खारा समंदर बन गया हूँ मैं।
— विकास कुमार
