धूप को चादर सायों को बिस्तर बना के सो गये,
वो गरीब थे घुटनों को आंतों में दबा के सो गये,

रात को अंधेरों ने दस्तक दी तो तड़प उठे,
देश के बच्चे ख्वाबों में रोटी बना के सो गये,

सियासत हर तरफ खुशहाली की बात करती है,
बीमार हैं कुछ बच्चे चरागों को बुझा के सो गये,

शहर की रोशनी ने छीन ली हैं आंखों की नींद,
हम गांवों की यादों को सीने में लगा के सो गये,

रोटी की खुशबू सूंघा के वो चुनाव जीते हैं,
हम किस्मत को कोसते सर झुका के सो गये,

-विकास कुमार