मैं चला उस ओर जिधर सूर्य की किरणें असीम प्रसुप्त पौरुष की रगों में धधकाने ज्वाला असीम विकट हुआ प्रशीतन अब और चुप न रह पाऊंगा मैं रवि की ज्वाला लेकर पौरुष की आग धधकाउंगा। जो बैठे दिल्ली में मूढ़ उदण्ड अति रोटी के चोर इच्छा पाले नोट वोट की करते घोर पाप हर ओर गिद्द नोंचते बोटी बोटी जनता आज कराहती है सिंहासन पर बैठे चोरों को तनिक लाज ना आती है। जो बैठे है चुप घरों में उनका भी इम्तहान लिखूंगा तटस्थ बन्धों को तोड़कर एक नया संग्राम रचूंगा समर स्वागत में खड़ा है लिए आज शोणित की आस या तो धूसरित कर लो खुद को या कर दो शत्रू का नाश। तिल तिल मरना इंसानों की बलिष्ठ भुजाओं का अपमान सत्ता के निकृष्ट ह्रदयों को कर दो आज कम्पायमान तभी अनल अक्षरों में तुम्हारा नया इतिहास बनाऊंगा मैं रवि की ज्वाला से फिर पौरुष की आग धधकाउंगा।