तेज़ हवा के झोंके
नज़ाकत फूलों की कहाँ समझते हैं
जिनका मर चुका पानी आँख का
हिफाज़त असूलों की कहाँ समझते हैं
उड़ते रहते हैं हवा में भले वो
शरारत झूलों की कहाँ समझते हैं
करते हों इबादत भले वो मगर
इबादत रसूलों की कहाँ समझते हैं
माफ़ करते हैं हमें बार बार पर
आदत भूलों की कहाँ समझते हैं