तेरी है रहमत खुदा और तेरी ही हैं शरारतें धँस रही ज़मीं कहीं गिर रही हैं इमारतें कई कमी रह गई हमसे इबादत में तेरी क्यों कर दिया पानी पानी तुने नज़रें फेरी फँसा है इंसान यहाँ खुद को समझे बेबस करते हैं फ़रियाद तू ज़रा थम कर बरस बह रहा सब कुछ यहाँ कुछ भी नहीं बचा क्यों कर रहा प्रलय ये कैसा खेल तूने रचा पानी है सबकुछ ये हम सब बख़ूबी जानते हैं पर ज़रूरत से ज़्यादा तुझसे नहीं माँगते हैं बरस बरस पर ऐसे मत की आफ़त हो जाये बन्दगी करते तेरे बन्दों की शामत हो जाये कर रक्षा हमारी तू हम तुझे ही अब पुकारते तेरी है रहमत खुदा और तेरी ही हैं शरारतें धँस रही ज़मीं कहीं गिर रही हैं इमारतें