फँसी फँसी जवानी लाल, पीली, हरी बत्तीयों में ढूँढना चाहता मैं आज फिर बचपन गाँव की पगडंडियों में पैन नहीं पकड़ा बहुत दिन हुये पर लिखा बहुत कुछ कभी दिन गुज़र जाता था लिख लिख कर फटती चिट्ठियों में खाने को खा लेता खाना मैं महँगा बहुत पेट भरने को स्वाद वो नहीं मिलता जो था चूल्हे की रोटी और भट्टियों में खुद में खुद को रोज खोजता रहता हूँ पर मिलता नहीं करता है मन की खो जाओ मैं आज फिर मैं रंग बिरंगी तितलियों में ज़िन्दगी रोज़ नई पहेली सी बनकर आती सुलझती नहीं बचपन तो जैसे गुज़र गया सभी बूझती हुई पहेलियों में रविवार तो आज भी आता पर लगता नहीं की छुट्टी है पूरे साल का मज़ा लेता था बचपन जब गर्मियों की छुट्टियों में फँसी फँसी जवानी लाल, पीली, हरी बत्तीयों में ढूँढना चाहता मैं आज फिर बचपन गाँव की पगडंडियों में