मुकम्मल सी कहाँ ज़िन्दगी उसपे वक्त की बेतहाशा रफ्तार हमारी रात इकाई, नींद दहाई ख्वाब सैंकडा और दर्द हज़ार नाम न लें आपका तो क्या करें बढ़ रही हिचकियों की रफ़्तार जमाना दुशमन हो गया हमारा क्योंकि हम करते हैं आप से प्यार आ जाओ दूर से वापस अब आप ओ मेरे शहंशाह, ओ मेरे सरकार पहले तो रोशन होती थी सुबहें, शामें अब तो सूना सूना है यहाँ रविवार मौसम कैसा भी हो अच्छा नहीं लगता आप आ जाओ तो हो जाये ख़ुशगवार बस भी करो अब और न तड़पाओ हमें राह तक रहा आपका विस्तारित परिवार मुकम्मल सी कहाँ ज़िन्दगी उसपे वक्त की बेतहाशा रफ्तार हमारी रात इकाई, नींद दहाई ख्वाब सैंकडा और दर्द हज़ार