मेरी माँ आज भी अनपढ़ है मैं माँगता एक, वो दो रोटी लेकर आती है थक कर जब भी घर पर मैं आता नींद नहीं आती पर वो थप थप कर सुलाती है निकलूँ जो करने कोई काम नया मैं घबराता पर वो मुझे मिठी दही चखाती है बचाती वो सारी बलाओं से मुझे आज भी मेरे वो नज़र का टिका लगाती है उसके लिये मुझसे अच्छा कोई नहीं न जाने वो मेरे कितने ऐब छुपाती है रो देती वो मुझे देखकर दुखी होता ख़ुश मैं,मुझे देखकर मुस्कुराती है मैं तो जाने कितनी दफे न निभा पाया वो हर हालात में अपना रिश्ता निभाती है खाना खाता मैं यहाँ वहाँ भरने को पेट पर स्वाद आता जब वो खाना बनाती है प्रथम दो पक्तियाँ कहीं से ली गयी हैं