आँखों से होती उत्पत्ति, गालों पर बिताए ज़िन्दगी, मंज़िल पर पहुँचते ही मर जाता है
आसूँ बनता है, निकलता है, बहता है और होंठों पर मुसकान बनकर बिखर जाता है
सोचते हैं ज़माने वाले कैसे खुद ब खुद बनता है सूखी आँखों में भी जन्म ले लेता है
कहीं बयाँ करी जाती इसकी ख़ूबसूरती और कहीं बयाँ ये ग़रीबी का मंज़र कर जाता है
कभी होता ये ख़ुशी का तो ये कभी ग़म का, होता पानी ही है बस नाम हो जाते अलग
ख़ुशी से दिल गद् गद् हो तो भी बनता है ये और जब दिल ये किसी दुख से भर जाता है
किसी चेहरे को ख़राब कर देता है ये और किसी चेहरे की ख़ूबसूरती बढ़ा देता है
जो आ जाये एक बार तो जाता नहीं जल्दी से, धीरे धीरे इसका दिमांग से असर जाता है
आँखों से होती उत्पत्ति, गालों पर बिताए ज़िन्दगी, मंज़िल पर पहुँचते ही मर जाता है
आसूँ बनता है, निकलता है, बहता है और होंठों पर मुसकान बनकर बिखर जाता है