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मंज़िल पर पहुँचते ही मर जाता है

आँखों से होती उत्पत्ति, गालों पर बिताए ज़िन्दगी, मंज़िल पर पहुँचते ही मर जाता है आसूँ बनता है, निकलता है, बहता है और होंठों पर मुसकान बनकर बिखर जाता है सोचते हैं ज़माने वाले कैसे खुद ब खुद बनता है सूखी आँखों में भी जन्म ले लेता है कहीं बयाँ करी जाती इसकी ख़ूबसूरती और कहीं बयाँ ये ग़रीबी का मंज़र कर जाता है कभी होता ये ख़ुशी का तो ये कभी ग़म का, होता पानी ही है बस नाम हो जाते अलग
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