मन करना चाहता है आज फिर आवारगी दिल में मेरे आज अरमां मचलता है कोई वो तो सो रहे घर में अपने बेख़बर चैन से क्या पता उन्हें यहाँ करवटें बदलता है कोई लड़ाई ज़माने में सारी उन्हीं की वजह से है कभी गिरता यहाँ तो कभी सँभलता है कोई चाँदनी रातों को दीदार को तरसा देते हैं वो भला अंधेरों में भी घर से निकलता है कोई नजरों में रहे उनकी क्या क्या नहीं किया हमनें भला इतनी जल्दी नज़रों में उतरता है कोई ख़्वाब तो ख़्वाब हैं हक़ीक़त बनते ही कहाँ हैं लगता है जैसे पलकों पे मेरी चलता है कोई शमा पे जल जाने की अदा पुरानी है परवाने की जुदाई की तपिश में लम्हा पिघलता है कोई मन करना चाहता है आज फिर आवारगी दिल में मेरे आज अरमां मचलता है कोई